
Ravi ji………

तुर्की पाकिस्तान और सऊदी अरब ने मक्का रक्षा समझौते के तहत यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों का मुक़ाबला करने के लिए सऊदी में सैन्य बलों की तैनाती पर सहमति जताई है तीनों देशों के रक्षा और विदेश मंत्रियों की रियाद में हुई आपात बैठक के बाद यह फ़ैसला किया गया सात अगस्त को समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद पहली बार इस रक्षा समझौते को सक्रिय किया गया है समझौते में कहा गया है कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला सभी देशों पर हमला माना जाएगा
सऊदी अरब के रक्षा मंत्री ख़ालिद बिन सलमान ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा मक्का रक्षा गठबंधन की रणनीतिक राजनीतिक और रक्षा समिति की आपात बैठक में हमलों का सामना करने के लिए एकजुटता और साझे रुख़ पर मुहर लगाई गई मक्का रक्षा गठबंधन के ढांचे के तहत इन हमलों और इनके पीछे खड़े सभी लोगों के ख़िलाफ़ सामूहिक जवाबी क्षमता को सक्रिय करने की पुष्टि की गई
इस समिति की बैठक में ख़ास तौर पर पवित्र शहरों मक्का और मदीना को निशाना बनाने वाले हमलों की निंदा की गई हालांकि उन्होंने हूतियों का नाम नहीं लिया
यह बैठक ऐसे समय हुई है जब सऊदी अरब के समर्थन वाली यमन की सरकारी सेनाओं ने बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया है यमनी सरकार के मुताबिक़ इस अभियान का मक़सद उन सभी इलाक़ों को फिर से हासिल करना है जिन पर हूतियों ने 12 साल से जारी युद्ध के दौरान क़ब्ज़ा कर लिया है यह अभी स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तान और तुर्की के सैनिकों की सऊदी अरब में तैनाती का युद्ध पर तत्काल सामरिक प्रभाव क्या होगा पाकिस्तान के पहले से ही सऊदी अरब में सैकड़ों सैनिक तैनात हैं समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने पिछले सप्ताह ख़बर दी थी कि पाकिस्तान ने सऊदी समर्थित सरकार की मदद के लिए पोर्ट सिटी अदन में हथियारों से भरे चार विमान भेजे थे
एक न्यूज़ वेबसाइट के मुताबिक तुर्की बिना संसद की मंज़ूरी के किसी विदेशी देश में सैन्य बलों को तैनात नहीं कर सकता रेगिप का कहना है कि इसका अपवाद किसी द्विपक्षीय समझौते के तहत सैन्य प्रशिक्षण हो सकता है तुर्की के संविधान के अनुच्छेद 92 के तहत आम तौर पर विदेश में अपने सशस्त्र बलों को तैनात करने के लिए संसद की मंज़ूरी ज़रूरी होती है
एक तुर्की अख़बार के मुताबिक सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ तुर्की की रक्षा साझेदारी का मतलब यह नहीं है कि अंकारा अपने आप किसी युद्ध में शामिल होने के लिए बाध्य हो जाएगा
जानकारों का कहना कि मक्का समझौते को महज एकजुटता की घोषणा से आगे बढ़ाकर एक ठोस प्रतिबद्धता में बदल दिया गा है जिसमें ज़मीन पर सैन्य बलों की तैनाती की बात की गई है यह वास्तव में अपेक्षा से कहीं ज़्यादा तेज़ी से हुआ है इससे मज़बूत प्रतिरोधक संदेश जाता है लेकिन इसका यह अर्थ भी है कि सामूहिक सुरक्षा संबंधी प्रावधान को सक्रिय कर दिया गया है इस तरह पहली चुनौती का जवाब सामने आ गया है
तुर्की के मुताबिक संभावना है कि अंकारा अगले 30 दिनों के भीतर मक्का समझौते या सैन्य तैनाती की मंज़ूरी को तुर्की की ग्रैंड नेशनल असेंबली के एजेंडे में लाएगा
हालांकि तुर्की का शुरुआती योगदान यमन में लड़ाकू सैनिकों की तैनाती के बजाय सऊदी अरब की धरती पर वायु रक्षा ड्रोन ख़ुफ़िया निगरानी और टोही से जुड़ी क्षमताओं के रूप में होने की ज़्यादा संभावना है इससे तुर्की सऊदी के सुरक्षा नेटवर्क में शामिल हो सकेगा और साथ ही अपने जोखिम और सैन्य भागीदारी के स्तर को नियंत्रित सीमा में रख सकेगा हालांकि यह काफ़ी संभावित है कि हूती आने वाले दिनों में रियाद की घोषणा के जवाब में सऊदी अरब के ऊर्जा बुनियादी ढांचे और दक्षिणी शहरों को निशाना बनाकर मिसाइल और ड्रोन हमले तेज़ कर देंगे हूती अपनी धमकियों में तुर्किये और पाकिस्तान का सीधे नाम भी ले सकते हैं अब असली सवाल यह है अगर युद्ध बढ़ता है तो मक्का समझौता किस तरह कार्रवाई करेगा
हलाकि अप्रैल 2015 में पाकिस्तानी संसद ने भी यमन के हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ लड़ रहे सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल होने के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया था तब पाकिस्तान के इस फ़ैसले से ईरान समर्थित विद्रोहियों के ख़िलाफ़ व्यापक सुन्नी मोर्चा बनाने की सऊदी की कोशिशों को झटका लगा था पाकिस्तान के सांसदों ने कहा था पाकिस्तान को यमन संघर्ष में तटस्थ रहना चाहिए ताकि संकट को ख़त्म करने के लिए वह सक्रिय कूटनीतिक भूमिका निभा सके पाकिस्तान मुस्लिम दुनिया का एकमात्र परमाणु शक्ति संपन्न देश है उसने ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ के रूप में भी भूमिका निभाई है और ख़ुद को एक निष्पक्ष मध्यस्थ के तौर पर पेश करने की कोशिश की है
वही तुर्की नेटो का सदस्य है और उसने ख़ुद को इसराइल के प्रतिद्वंद्वी के तौर पर स्थापित किया है ग़ज़ा में इसराइल के युद्ध के कारण अरब और मुस्लिम दुनिया में इसराइल काफ़ी अलोकप्रिय है संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार विशेषज्ञों ने ग़ज़ा में इसराइल की कार्रवाई को जनसंहार कहा है
हलाकि मक्का समझौते का हवाला देकर सऊदी अरब यह रेखांकित कर सकता है कि हूतियों के ख़िलाफ़ उसके जवाबी अभियान को व्यापक क्षेत्रीय समर्थन हासिल है
पिछले सप्ताह सऊदी अरब ने संयुक्त अरब अमीरात के उपराष्ट्रपति मंसूर बिन ज़ायद की भी मेज़बानी की थी इसका मक़सद भी हूतियों के ख़िलाफ़ एकजुटता दिखाना था वही सऊदी अरब के समर्थन वाली यमनी सेनाओं ने कहा कि उन्होंने हूतियों के क़ब्ज़े वाले ज़्यादातर तटीय इलाक़ों को फिर से अपने नियंत्रण में ले लिया है वही ब्रिटिश अख़बार के मुताबिक 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से अरब देशों ने जिस ईरानी शासन को गंभीर ख़तरा माना है वह अब भी कायम है
एक समाचार पत्र के मुताबिक ईरान ने पूरे क्षेत्र में सैन्य ठिकानों ऊर्जा प्रतिष्ठानों हवाई अड्डों और अन्य बुनियादी ढांचे पर हमले किए इसके बाद खाड़ी के देशों ने सुरक्षा के प्रमुख गारंटर के रूप में अमेरिका पर अपनी निर्भरता का फिर से आकलन करना शुरू किया इसका नतीजा यह हुआ कि सऊदी अरब तुर्की और पाकिस्तान ने इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का में प्रतीकात्मक रूप से हस्ताक्षर किए गए एक आपसी रक्षा समझौते पर सहमति जताई यह समझौता इस समझ को दर्शाता है कि ईरान और युद्ध से पैदा हुई अस्थिरता से लड़ने के लिए अमेरिका के भरोसे नहीं रहा जा सकता
मक्का समझौते के दूसरी ओर अब्राहम समझौते के सहयोगी देश हैं जिनमें ख़ास तौर पर यूएई शामिल है यूएई और सऊदी अरब के बीच मतभेद धीरे.धीरे बढ़ रहे हैं और यूएई अपने पारंपरिक अरब साझेदारों से स्वतंत्र रास्ता तेज़ी से अपना रहा है साथ ही इसराइल के साथ अपने संबंधों को और मज़बूत कर रहा है
इस तरह की खोजी